गंगा ने क्रोध में शिव को शीतल किया, शिव ने जटा में बाँध लिया कल्पों तक — फिर एक श्राप ने उन्हें ला खड़ा किया उज्जैन के इसी शिवलिंग के सामने
"स्वर्ग में एक दृष्टि की भूल, धरती पर सदियों का श्राप — गंगेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से मुक्त हुईं स्वयं माँ गंगा"

उज्जैन के 84 महादेव: श्री गंगेश्वर महादेव (42वें महादेव)
जहाँ स्वयं माँ गंगा को भी श्राप-मुक्ति के लिए शिव-दर्शन करना पड़ा
डॉ.नवीन आनंद जोशी
उज्जैन के महाकाल वन में, क्षिप्रा नदी के दक्षिणी तट पर, मंगलनाथ मंदिर के समीप विराजमान हैं श्री गंगेश्वर महादेव — 84 महादेवों की पावन शृंखला में 42वें स्थान पर पूजित यह शिवलिंग उस अद्भुत कथा का साक्षी है जिसमें स्वयं देवनदी माँ गंगा को भी अपनी मुक्ति के
लिए देवाधिदेव भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी थी।
कथा का आरंभ अयोध्या के राजा सगर से होता है, जिनके साठ हज़ार पुत्र महर्षि कपिल मुनि के तपोबल से भस्म हो गए थे। उनकी मुक्ति तभी संभव थी जब स्वर्ग की गंगा धरती पर उतरकर उनकी भस्म का स्पर्श करे। पीढ़ियों के अथक प्रयास के बाद राजा भगीरथ की अटूट तपस्या से गंगा धरती पर अवतरित होने को तैयार हुईं। परंतु गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि सीधे पृथ्वी पर गिरने से समस्त सृष्टि विदीर्ण हो सकती थी। तब भगवान शिव ने भगीरथ की प्रार्थना पर गंगा को अपनी विशाल जटाओं में धारण कर लिया।
यहीं वह मार्मिक प्रसंग घटित होता है जो इस कथा को और गहरा बनाता है। जटाओं में समाकर शिव ने गंगा को तुरंत धरती पर नहीं उतरने दिया — इससे गंगा क्रोधित हो उठीं, और अपने क्रोध में उन्होंने भगवान शिव के शरीर को अत्यंत शीतल कर दिया। आशुतोष भी इस पर क्रोधित हुए, और प्रत्युत्तर में उन्होंने गंगा को अपनी जटाओं में और भी दृढ़ता से बाँध लिया। कई कल्पों तक गंगा शिव की जटाओं में ही तपस्यारत रहीं, जब तक कि भगीरथ की निरंतर उपासना से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पुनः मुक्त कर धरती पर उतरने दिया। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जब दो महान शक्तियाँ भी अहं और क्रोध में उलझ जाती हैं, तब भी किसी निश्छल भक्त की सतत प्रार्थना ही अंततः सामंजस्य स्थापित करती है।
धरती पर अवतरण के पश्चात गंगा समुद्र की पत्नी हुईं। कुछ काल बाद, जब समस्त देवी-देवता ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी की स्तुति हेतु एकत्रित हुए, तब गंगा और समुद्र भी वहाँ पहुँचे। उसी समय प्रबल वायु के झोंके से गंगा का आँचल उड़ गया। यह देखकर उपस्थित सभी देवताओं ने मर्यादावश तुरंत अपने मुख नीचे कर लिए, परंतु महाभिष नामक राजऋषि उन्हें एकटक देखते रहे। इस अमर्यादित दृष्टि को देखकर ब्रह्माजी ने उन्हें मृत्युलोक में भेज दिया। यह देख समुद्र को भी अत्यंत ग्लानि हुई और उन्होंने क्रोधवश गंगा को मृत्युलोक में ही रहने का श्राप दे दिया।
विलाप करती हुई गंगा ने ब्रह्माजी से क्षमा और मुक्ति की विनती की। ब्रह्माजी ने उन्हें आदेश दिया कि वे महाकाल वन में, शिप्रा नदी के दक्षिण में स्थित शिवलिंग का श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करें। आज्ञा पाकर गंगा अपनी सखी शिप्रा के साथ महाकाल वन आईं और उसी शिवलिंग के समक्ष विधिवत पूजा-अर्चना की। भक्ति-भाव से किए गए इस दर्शन मात्र से गंगा श्राप से मुक्त हो गईं। ठीक उसी क्षण समुद्र भी वहाँ प्रकट हुए और गंगा का यथोचित सम्मान किया। चूँकि इसी दर्शन-पूजन से गंगा को मुक्ति मिली, यह शिवलिंग सदा के लिए गंगेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हो गया।
यह सम्पूर्ण कथा अत्यंत गहन जीवन-सत्य समेटे हुए है। गंगा, जो स्वयं पवित्रता और मोक्ष की प्रतीक हैं, वे भी क्रोध, अभिमान और मर्यादा-उल्लंघन के परिणामस्वरूप श्राप और पीड़ा से नहीं बचीं। यह हमें सिखाता है कि चाहे कोई कितना भी महान, पूज्य या शक्तिशाली क्यों न हो, मर्यादा और संयम का पालन सभी के लिए अनिवार्य है। साथ ही यह भी सिखाता है कि चाहे पतन और श्राप कितना भी बड़ा क्यों न हो, भगवान शिव की सच्ची शरणागति में हर बंधन से मुक्ति संभव है।
गंगेश्वर महादेव के दर्शन का विशेष महत्व है — यही वह पावन काल है जब महादेव अपने भक्तों की प्रत्येक पुकार शीघ्रता से सुनते हैं। मान्यता है कि इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से समस्त तीर्थों की यात्रा का पुण्यफल प्राप्त होता है, और श्रद्धालु अंतकाल में परम गति को प्राप्त करता है — ठीक वैसे ही जैसे स्वयं माँ गंगा को यहाँ दर्शन से मुक्ति मिली थी।
क्षिप्रा तट पर खड़ा होकर जब श्रद्धालु गंगेश्वर महादेव के दर्शन करता है, वह केवल एक शिवलिंग नहीं देखता — वह उस स्थान को नमन करता है जहाँ स्वयं देवनदी गंगा ने भी विनम्रतापूर्वक शिव के चरणों में शीश झुकाया था।
उज्जैन के चौरासी महादेवों की इस शृंखला का यह अध्याय सिखाता है कि मुक्ति और मर्यादा किसी के लिए भी अपवाद नहीं रखतीं — देवी हों या मनुष्य, शिव-शरण ही अंतिम आश्रय है। यही गंगेश्वर महादेव का सनातन संदेश है —
जो स्वयं गंगा को श्राप से मुक्त कर सके, उस शिवलिंग के आगे संसार का कोई भी बंधन टिक नहीं सकता है ।
यात्रा निरंतर जारी



