84 महादेव यात्रा की 52वीं कड़ी: ओंकारेश्वर महादेव की महिमा: ‘ॐ’ में समाहित है सृष्टि का रहस्य, अहंकार का अंत और आत्मबोध का आरंभ

डॉ. नवीन आनंद जोशी
उज्जैन की पावन धरती केवल मंदिरों और तीर्थों की नगरी नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, आध्यात्मिक चेतना और जीवन के गूढ़ रहस्यों की साक्षी है। भगवान महाकालेश्वर की इस नगरी में 84 महादेवों की यात्रा श्रद्धालु को शिवत्व के विविध स्वरूपों से परिचित कराती है। इसी
पावन यात्रा की 52वीं कड़ी में ओंकारेश्वर महादेव की महिमा हमें सृष्टि की उत्पत्ति, आत्मा के स्वरूप और परम चेतना में विलीन होने का संदेश देती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय भगवान शिव ने एक दिव्य पुरुष को प्रकट किया। उस पुरुष ने शिव से पूछा कि उसे कौन-सा कार्य करना चाहिए। भगवान शिव ने उसे अपनी आत्मा का विभाग करने की आज्ञा दी। इस आज्ञा का अर्थ न समझ पाने के कारण वह दिव्य पुरुष चिंतित हो गया। तभी उसके शरीर से एक अन्य दिव्य पुरुष प्रकट हुआ, जिसे भगवान शिव ने ‘ॐकार’ नाम दिया।
शिव की आज्ञा से ॐकार ने वेदों, देवताओं, सृष्टि, मनुष्यों और ऋषियों की उत्पत्ति की तथा अपना कार्य पूर्ण कर भगवान शिव के सम्मुख उपस्थित हुआ। उसकी साधना और कार्य से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे महाकाल वन जाने और वहाँ शूलेश्वर महादेव के पूर्व दिशा में स्थित शिवलिंग का पूजन करने का निर्देश दिया। ॐकार वहाँ पहुँचा, शिवलिंग के दर्शन किए और उसी में लीन हो गया। धार्मिक मान्यता है कि इसी कारण वह शिवलिंग ओंकारेश्वर अथवा ॐकारेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुआ।
इस कथा का मर्म केवल एक पौराणिक प्रसंग में नहीं, बल्कि जीवन के गहरे दर्शन में छिपा है। भारतीय परंपरा में ‘ॐ’ को प्रणव कहा गया है। यह एक अक्षर होते हुए भी सृष्टि, चेतना और परम सत्य के चिंतन का प्रतीक है। उपनिषदों में भी ॐ के माध्यम से आत्मा और ब्रह्म के संबंध को समझने का मार्ग बताया गया है। ओंकारेश्वर महादेव की कथा इसी शाश्वत विचार को सामने रखती है कि जिस चेतना से जीवन का उद्भव हुआ है, उसकी पूर्णता भी उसी परम चेतना के बोध में है।आज का मनुष्य धन, पद, प्रतिष्ठा और सफलता की दौड़ में निरंतर आगे बढ़ रहा है। इन उपलब्धियों के बीच वह कई बार अपने भीतर झाँकना भूल जाता है। वह दूसरों को जीतने का प्रयास करता है, लेकिन अपने अहंकार पर विजय प्राप्त करना कठिन समझता है। ओंकारेश्वर महादेव की महिमा हमें बताती है कि सच्ची उपलब्धि केवल बाहरी संसार को जीतने में नहीं, बल्कि स्वयं को समझने में है।नदी का जल अनेक मार्गों से बहकर अंततः विशाल जलराशि में मिल जाता है। उसी प्रकार मनुष्य की जीवन-यात्रा भी आत्मबोध और समर्पण की ओर बढ़ सकती है। अहंकार का त्याग करने का अर्थ कर्म से विमुख होना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य को निष्ठा, विनम्रता और लोककल्याण की भावना से निभाना है।
उज्जैन के 84 महादेवों की यात्रा का यही आध्यात्मिक संदेश है कि आस्था केवल मंदिर में दीप जलाने तक सीमित न रहे। उसका प्रकाश हमारे विचारों, व्यवहार और सामाजिक जीवन में भी दिखाई दे। जब पूजा से करुणा, साधना से संयम और शिव-स्मरण से सदाचार उत्पन्न होता है, तभी भक्ति जीवन को सार्थक बनाती है।
ओंकारेश्वर महादेव की यह कड़ी हमें याद दिलाती है कि समय सीमित है, अहंकार क्षणिक है और सत्य की खोज शाश्वत। जीवन में विनम्रता, सेवा और आत्मचिंतन को स्थान देकर ही हम शिवत्व के निकट पहुँच सकते हैं।84 महादेवों की यात्रा निरंतर चलती रहेगी। हर शिवालय एक नई कथा, हर कथा एक नया संदेश और हर दर्शन आत्मबोध की दिशा में एक नया कदम है।
जय महाकाल! जय ओंकारेश्वर महादेव!



