जब ब्रह्मा-विष्णु भी बचने दौड़े, महाकाल वन में शिव ने दी अभय की शक्ति

अभयेश्वर महादेव 84 महादेव की 48 वीं कड़ी
डॉ.नवीन आनंद जोशी
उज्जैन का वह शिवलिंग जहाँ स्वयं सृष्टिकर्ता को मिला अभयदान — अभयेश्वर महादेव की अनसुनी गाथा भय से मुक्ति चाहिए तो जानिये
कैसे ब्रह्मा-विष्णु ने भी मांगी थी अभयेश्वर महादेव से शरण**अभयेश्वर महादेव, जहाँ ब्रह्मा जी और विष्णु जी को भी मिला था भय से मुक्ति का वरदान**
सृष्टि के आदि से लेकर अंत तक, समय का चक्र अपने निर्धारित नियमों से चलता रहा है। किंतु एक समय ऐसा भी आया जब स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के मन में एक गहन चिंता ने जन्म लिया। उन्हें आभास हुआ कि प्रत्येक कल्प के समापन पर चंद्रमा और सूर्य, जो सृष्टि के संचालन के मूल आधार हैं, भी अंततः नष्ट हो जाएँगे। इस विचार मात्र से ब्रह्मा जी का हृदय व्याकुल हो उठा। यदि प्रकाश के ये दोनों नेत्र ही न रहे, तो नवीन सृष्टि की स्थापना किस विधि से संभव होगी?
इसी चिंता में डूबे ब्रह्मा जी के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हुई, और उन आंसुओं से दो भयंकर दैत्यों, हारव और कालकेलि, का प्राकट्य हुआ। दैत्यत्व के स्वभाव के अनुरूप, उत्पत्ति के तुरंत पश्चात ही उनकी दृष्टि अपने ही जन्मदाता ब्रह्मा जी पर पड़ी, और वे उन्हें ही समाप्त करने के उद्देश्य से उनकी ओर दौड़ पड़े। भय से आतंकित होकर पितामह ब्रह्मा जी वहाँ से पलायन कर गए।
भागते हुए ब्रह्मा जी को समुद्र के मध्य एक दिव्य प्रकाशपुंज दिखाई दिया। उस तेजस्वी पुरुष से जब उन्होंने परिचय पूछा, तो ज्ञात हुआ कि यह स्वयं सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु हैं। ब्रह्मा जी ने अत्यंत विनम्रता से उनसे उन दोनों दैत्यों से रक्षा की प्रार्थना की। किंतु नियति ऐसी थी कि वे दुष्ट दैत्य विष्णु जी को भी अपना लक्ष्य बनाकर उनकी ओर दौड़ पड़े। स्थिति की भयावहता को देखकर ब्रह्मा जी और विष्णु जी, दोनों ही सृष्टि के अधिष्ठाता देव, समुद्र में जा छिपे।ऐसे संकटपूर्ण क्षण में एक आकाशवाणी हुई, जिसमें ब्रह्मा जी को महाकाल वन में, नूपुरेश्वर के दक्षिण दिशा में स्थापित पवित्र शिवलिंग के पूजन का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। यह संकेत पाकर ब्रह्मा जी और विष्णु जी दोनों उस पावन स्थल पर पहुँचे और अत्यंत श्रद्धा एवं भक्तिभाव से शिवलिंग की आराधना करने लगे।
भक्ति की इस पराकाष्ठा से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने साक्षात दर्शन देकर दोनों देवताओं के भय का कारण पूछा। ब्रह्मा जी ने संपूर्ण वृत्तांत विनम्रतापूर्वक निवेदित किया। करुणासागर शिव ने बिना विलंब किए दोनों देवताओं को अपने उदर में समाहित कर लिया और उन्हें पूर्ण सुरक्षा प्रदान की। कुछ काल पश्चात जब ब्रह्मा जी और विष्णु जी पुनः बाहर आए, तो देखा कि उन दोनों भयंकर दैत्यों, हारव और कालकेलि, का शिव की अनंत शक्ति द्वारा पूर्णतः भस्मीकरण हो चुका था।इस दिव्य लीला से अभिभूत होकर ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने भगवान शिव से एक विशेष वरदान की याचना की कि जो भी मनुष्य इस शिवलिंग का श्रद्धापूर्वक दर्शन करे, उसे भय से सदा के लिए मुक्ति प्राप्त हो। महादेव ने इस प्रार्थना को स्वीकार किया, और तभी से यह शिवलिंग “अभयेश्वर महादेव” के नाम से संसार में विख्यात हुआ।
धार्मिक मान्यता है कि अभयेश्वर महादेव का दर्शन-पूजन करने वाले भक्त को जीवन में धन, संतान और परिवार के वियोग की पीड़ा नहीं सहनी पड़ती। ऐसा साधक सांसारिक सुखों का सम्यक भोग करते हुए, अंतकाल में परमगति को प्राप्त होता है, अर्थात उसकी आत्मा को मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
84 महादेव शृंखला की इस कड़ी में अभयेश्वर महादेव की कथा हमें एक गहन जीवन-सत्य का बोध कराती है। जब सृष्टि के महानतम शक्तिपुंज ब्रह्मा जी और विष्णु जी स्वयं भय के क्षणों में महादेव की शरण में गए, तो साधारण मनुष्य के लिए भी यह संदेश स्पष्ट है कि जीवन के प्रत्येक संकट, प्रत्येक भय और प्रत्येक अनिश्चितता का समाधान केवल शिव-शरणागति में ही निहित है। भय चाहे विनाश का हो, अस्तित्व का हो, या भविष्य की अनिश्चितता का, अभयेश्वर महादेव की आराधना मनुष्य को उस निर्भयता की अवस्था तक ले जाती है, जहाँ आत्मा भौतिक भय के बंधनों से ऊपर उठकर परम शांति का अनुभव करती है।
उज्जैन के महाकाल वन में स्थित यह पावन शिवलिंग आज भी भक्तों को यही संदेश देता प्रतीत होता है। जिस प्रकार संकट की घड़ी में स्वयं ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने शिव की शरण ली, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को भी अपने जीवन के संघर्षों में महादेव की भक्ति में आश्रय खोजना चाहिए। यही अभयेश्वर महादेव की गाथा का शाश्वत संदेश है, और यही कारण है कि सदियों बीत जाने के बाद भी श्रद्धालु दूर-दूर से इस दिव्य स्थल पर आकर अभय और मोक्ष की कामना लेकर शीश झुकाते हैं।
यात्रा निरंतर जारी….



