लेख

84 महादेव की धर्म यात्रा में 44 वाँ पड़ाव उत्तरेश्वर महादेव

“वो शिवलिंग जिसने सिखाया आसमान को अनुशासन, आज भी वही सबक दोहराता है हर लौटता मानसून”

डॉ.नवीन आनंद जोशी

**धरती जलमग्न हो रही थी, यज्ञ थम गए थे…फिर शिव ने मेघों को दी वह शिक्षा, जो आज भी हर बरसात में गूंजती है****इंद्र भी नहीं कर सके समाधान, तब भोलेनाथ ने संभाली सृष्टि की डोर: महाकाल वन की यह गाथा आज तक अनकही रही****उत्तर से आते हैं, बरसते हैं, लौट जाते हैं: मानसून के पीछे छिपा है शिव की आराधना का वह प्राचीन रहस्य****84 महादेव शृंखला में**करुणानिधान शिव ने बदली मेघों की दिशा: उत्तरेश्वर महादेव, जहां क्रोध ने पाया साधना का मार्ग **धरती डूब रही थी, यज्ञ बंद हो गए थे…फिर भगवान् शिव ने बादलों को सिखाया वो पाठ, जो आज भी बरसात के मौसम में गूंजता है**
महाकाल वन में विराजमान 84 महादेवों की श्रृंखला में उत्तरेश्वर महादेव का स्थान अत्यंत विशिष्ट है, क्योंकि यहां की कथा केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि प्रकृति, मर्यादा और आत्मसंयम के गूढ़ रहस्य को उजागर करती है। प्राचीन काल में देवराज इंद्र के अनुशासन में मेघ नियमबद्ध होकर वर्षा करते थे—न अधिक, न कम, ठीक उतनी जितनी धरती को चाहिए थी। इसी संतुलन से अन्न पकता, नदियां प्रवाहित होतीं और यज्ञ-हवन निर्बाध चलते रहते। किंतु कालांतर में मेघों ने मर्यादा त्यागकर अपनी इच्छानुसार बरसना आरंभ कर दिया। कहीं जलप्लावन तो कहीं सूखा, यह असंतुलन इतना बढ़ा कि पृथ्वी जलमग्न होने लगी, नदियां उफान पर आ गईं और यज्ञ-हवन तक ठप्प पड़ गए। भयभीत ऋषि-मुनि इस विपदा को लेकर ब्रह्मा जी के समक्ष उपस्थित हुए और अपनी व्यथा सुनाई।ब्रह्मा जी के आदेश पर देवगुरु बृहस्पति ने देवराज इंद्र को स्मरण किया। इंद्र ने विनम्रतापूर्वक पूछा—”महाप्रभु, मेरे लिए क्या आदेश है?” देवगुरु ने पृथ्वी की त्रासदी का संपूर्ण वृत्तांत सुनाया। इंद्र ने तत्काल मेघराज को बुलाकर मर्यादा में रहने का आदेश दिया। कुछ काल तक अनुशासन बना रहा, किंतु शीघ्र ही मेघों का उग्र स्वभाव पुनः जाग उठा और उन्होंने प्रलयतुल्य वर्षा से संपूर्ण सृष्टि में हाहाकार मचा दिया। स्वयं इंद्र भी इस उपद्रव को शांत करने में असमर्थ रहे और अंततः वे भगवान भोलेनाथ की शरण में पहुंचे। समस्त वृत्तांत सुनकर करुणानिधान शिव ने उत्तर दिशा के मेघों को आह्वान किया, जिनके साथ एक करोड़ मेघ उपस्थित हुए। सभी ने विनयपूर्वक भगवान से आज्ञा मांगी। तब शिव ने आदेश दिया—”तुम महाकाल वन में जाकर भगवान गंगेश्वर की आराधना करो, इससे तुम्हारा क्रोध शांत होगा और अनावश्यक वर्षा की प्रवृत्ति स्वतः समाप्त हो जाएगी।” मेघों ने शिवाज्ञा शिरोधार्य कर घोर आराधना की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान दिया कि यह पावन स्थल उत्तरेश्वर नाम से त्रिलोक में विख्यात होगा और यहां स्थापित शिवलिंग सदा-सर्वदा उत्तरेश्वर महादेव के नाम से पूजित होगा।
रोचक बात यह है कि यही आख्यान आज भी भारत की धरती पर साक्षात घटित होता दिखाई देता है। जिस प्रकार कथा में “उत्तर के मेघ” विशेष रूप से उल्लिखित हैं, वैसे ही आज विज्ञान भी बताता है कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई के पश्चात अक्टूबर से दिसंबर के मध्य उत्तर-पूर्वी दिशा से लौटता हुआ मानसून सक्रिय होता है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव तमिलनाडु और दक्षिण-पूर्वी तटीय क्षेत्रों पर पड़ता है। यह दर्शाता है कि भारत में वर्षा एक ही दिशा, एक ही समय अथवा एक ही स्वभाव की बंधक नहीं—हवाएं आती हैं, दिशा बदलती हैं, लौटती हैं, और प्रत्येक क्षेत्र को यथासमय जल प्रदान करती हैं। यहीं से भारतीय दर्शन का वह गूढ़ सत्य प्रकट होता है कि प्रकृति अपनी मनमानी से नहीं, अपितु ऋतु और नियम के अनुशासन में ही गतिशील रहती है।
उत्तरेश्वर महादेव की यह कथा वस्तुतः मनुष्य के भीतर उठने वाले क्रोध का ही रूपक है। जिस प्रकार मेघों में कभी संयम तो कभी उग्रता की लहर उठती रही, ठीक वैसे ही मनुष्य के मन में भी क्रोध की तरंगें कभी चढ़ती हैं तो कभी उतरती हैं। इच्छा जब मर्यादा लांघती है तो असंतोष जन्म लेता है, असंतोष बढ़कर क्रोध बनता है, और अनियंत्रित क्रोध विवेक को ढक देता है। स्वयं भगवान शिव, जिनके ललाट पर तीसरा नेत्र क्रोध का प्रतीक माना जाता है, इस कथा में क्रोध को नष्ट नहीं करते बल्कि उसे आराधना और साधना के मार्ग पर मोड़ देते हैं—यही सनातन धर्म का सबसे मार्मिक संदेश है। शक्ति का दमन नहीं, अपितु उसका परिष्कार ही वास्तविक कल्याण है।
आज भी भारत के अनेक गांवों में जब वर्षा रुक जाती है, तो लोग सामूहिक रूप से खुले आकाश तले भोजन बनाकर इंद्र और प्रकृति का स्मरण करते हैं—यह केवल जल-याचना नहीं, अपितु यह स्वीकारोक्ति है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका विनम्र अंश मात्र है। किसान बीज बो सकता है, श्रम कर सकता है, किंतु वर्षा उसके अधिकार क्षेत्र से परे है। उत्तरेश्वर महादेव की यह गाथा इसीलिए युगों बाद भी उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है, क्योंकि यह मनुष्य को इच्छा, आसक्ति और क्रोध के चक्र से बचकर संयम और धर्म की मर्यादा में रहने की शिक्षा देती है। महाकाल वन की यह पावन भूमि आज भी उन असंख्य श्रद्धालुओं की साक्षी है, जो उत्तरेश्वर महादेव के दर्शन कर अपने भीतर के उग्र भावों को शिव-चरणों में समर्पित कर शांति प्राप्त करते हैं।

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