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84 महादेव यात्रा त्रिलोचनेश्वर महादेव 45 वां चरण: महादेव की शरण में बीता जीवन कभी व्यर्थ नहीं जाता — कबूतर से गंधर्व तक की अलौकिक यात्रा

डॉ.नवीन आनंद जोशी
“भगवान महादेव के मंदिर में बसा था कबूतर-युगल, अगले जन्म में गंधर्व बनकर लौटा त्रिलोचनेश्वर की चौखट पर”
*महादेव के मंदिर में सुनी शिवभक्ति, अगले जन्म में फिर खींच लाई त्रिलोचनेश्वर की चौखट तक*

उज्जैन। महाकाल की नगरी अवंतिका में बिरजनामा मंदिर की पीठ पर स्थित श्री त्रिलोचनेश्वर महादेव से जुड़ी कबूतर के एक जोड़े की कथा सनातन परंपरा में कर्म, संस्कार, पुनर्जन्म और शिवभक्ति की गहन अवधारणा को सामने रखती है। कहा जाता है कि वर्षों पूर्व त्रिलोचनेश्वर महादेव के मंदिर में कबूतर का एक जोड़ा रहता था। दोनों प्रतिदिन भगवान महादेव के दर्शन करते, भक्तों द्वारा अर्पित जल पीते तथा मंदिर में होने वाले भगवान के जयकारों, भजन-कीर्तन और शिव आराधना को सुनते रहते थे। उन्हें न मंत्रों का ज्ञान था और न पूजा की विधि का, लेकिन उनका जीवन निरंतर शिवमय वातावरण में बीत रहा था। सनातन दृष्टि में देवदर्शन, भगवन्नाम का श्रवण, सत्संग और तीर्थभूमि में बिताया गया समय जीव के भीतर संस्कार उत्पन्न करने वाला माना गया है। एक दिन वहां एक श्येन आया और कबूतरों को अपना आहार बनाने की इच्छा से उन पर नजर रखने लगा। कबूतरी ने श्येन को देख लिया और चिंता करते हुए कबूतर को सावधान किया। एक दिन श्येन कबूतर को अपने पंजों में दबाकर आकाश मार्ग से ले गया। अपने साथी को बचाने के लिए कबूतरी ने श्येन के पंजों में चोंच मारना शुरू कर दिया। उसके प्रयास से कबूतर श्येन के पंजों से छूटकर नीचे गिर पड़ा और जंबूद्वीप में गिरकर उसकी मृत्यु हो गई। कथा के अनुसार, त्रिलोचनेश्वर महादेव के मंदिर में रहते हुए प्राप्त शिवभक्ति के संस्कार उसके साथ समाप्त नहीं हुए। अगले जन्म में वह मंदारा नामक गंधर्व के यहां ‘परिमल’ के रूप में जन्मा, जबकि कबूतरी ने नागराज के यहां ‘रत्नावली’ के रूप में जन्म लिया। परिमल किशोरावस्था से ही त्रिलोचनेश्वर महादेव के दर्शन और पूजन के लिए अवंतिका आने लगा। दूसरी ओर रत्नावली के मन में भी महादेव के दर्शन और पूजन की प्रबल अभिलाषा जागी और वह भी अवंतिका आने लगी।

एक दिन रत्नावली अपनी सखियों के साथ मंदिर में ही सो गई। भगवान शिव ने उसे दर्शन देकर उसके पूर्वजन्म का वृत्तांत सुनाया और परिमल के साथ उसके पूर्वजन्म के ऋणानुबंध से अवगत कराया। रत्नावली ने यह दिव्य अनुभव अपने माता-पिता को बताया। कुछ समय बाद परिमल और नागराज अपने-अपने परिवार के साथ त्रिलोचनेश्वर महादेव के पूजन के लिए आए। वहां दोनों परिवारों के बीच शिप्रा द्वारा कन्याओं को दिए गए वरदान से संबंधित प्रसंग पर चर्चा हुई और अंततः परिमल के साथ विवाह संपन्न हुआ। विवाह के पश्चात परिमल वहीं रहकर भगवान त्रिलोचनेश्वर महादेव की आराधना और पूजन करने लगा। कबूतरों का यह प्रसंग सनातन परंपरा में वर्णित अमरनाथ की अमरकथा की भी स्मृति कराता है, जिसमें मान्यता है कि भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य सुनाए जाने के समय कबूतरों के एक जोड़े ने उस अमरकथा का श्रवण किया और अमरत्व प्राप्त किया। दोनों कथाओं में कबूतरों का प्रसंग एक गहरा आध्यात्मिक संकेत देता है—ईश्वर के सान्निध्य में बिताया गया समय, देवदर्शन, सत्संग और शिवनाम का श्रवण जीव के संस्कारों को प्रभावित कर सकता है। त्रिलोचनेश्वर महादेव की कथा आज के मनुष्य को भी यही प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में क्या सुनते हैं, क्या देखते हैं और किस संगति में रहते हैं, इसका हमारे अंतर्मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। महाकाल की नगरी अवंतिका की यही महिमा है कि यहां शिव केवल मंदिरों में विराजमान देवस्वरूप नहीं, बल्कि जीवन, मृत्यु, कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष के अधिष्ठाता के रूप में स्मरण किए जाते हैं। मान्यता है कि जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक श्री त्रिलोचनेश्वर महादेव के दर्शन एवं पूजन करता है, वह समस्त सुखों का भोग करते हुए अंतकाल में परमपद को प्राप्त करता है। इस प्रकार यह कथा केवल कबूतर के एक जोड़े की कथा नहीं, बल्कि शिवभक्ति, संस्कार, ऋणानुबंध, पुनर्जन्म और महादेव की अनंत कृपा का दिव्य आख्यान है, जो प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में सत्संग, सद्विचार और ईश्वर-स्मरण के संस्कार विकसित करने की प्रेरणा देता है। हर-हर महादेव।

यात्रा निरंतर जारी

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