लेख

उज्जैन के 84 महादेव (भाग–40): कुण्डेश्वर महादेव – जहां भैरव-पूजन से प्राप्त होती है मातृकृपा की अक्षय निधि

डॉ.नवीन आनंद जोशी 

उज्जयिनी की पावन भूमि केवल ज्योतिर्लिंग श्री महाकालेश्वर के कारण ही विश्वविख्यात नहीं है, बल्कि यहां स्थित चौरासी महादेवों की परंपरा भी सनातन संस्कृति की अनुपम आध्यात्मिक धरोहर है। प्रत्येक शिवलिंग अपने भीतर एक दिव्य इतिहास, एक जीवनोपयोगी संदेश और धर्म के किसी गूढ़ सिद्धांत को समेटे हुए है। अंकपात मार्ग पर संदीपनी आश्रम के समीप स्थित कुण्डेश्वर महादेव भी ऐसा ही एक सिद्ध तीर्थ है, जहां शिव, शक्ति और भैरव-तत्त्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यह केवल उपासना का स्थान नहीं, बल्कि मातृशक्ति, सेवाभाव और कर्तव्यनिष्ठा के सनातन आदर्श का जीवंत प्रतीक है।
स्कन्दपुराण के अवन्ती खण्ड में वर्णित कथा के अनुसार एक समय माता पार्वती ने भगवान शिव से अपने पुत्र वीरक की कुशल पूछी। भगवान शिव ने बताया कि वीरक महाकाल वन में तपस्या कर रहा है। पुत्र-दर्शन की उत्कट इच्छा से माता स्वयं भगवान शिव के साथ नंदी पर आरूढ़ होकर महाकाल वन की ओर प्रस्थान करती हैं। मार्ग में एक पर्वत पर माता को भय का अनुभव होता है। तब भगवान शिव उन्हें अपने परम विश्वस्त गण कुण्ड की देखरेख में छोड़कर आगे चले जाते हैं।समय बीतता गया। वर्षों की प्रतीक्षा के बाद भी भगवान शिव वापस नहीं लौटे। माता पार्वती की व्याकुलता बढ़ती गई। कुण्ड गण अपनी पूरी निष्ठा और सेवा के बावजूद उन्हें शिव-दर्शन नहीं करा सका। क्षणिक क्रोध में माता ने उसे मनुष्य लोक में जन्म लेने का श्राप दे दिया। तभी भगवान शिव वहां प्रकट हुए। माता का हृदय करुणा से भर उठा और उन्होंने उसी श्राप को कल्याणकारी वरदान में परिवर्तित करते हुए आदेश दिया कि कुण्ड महाकाल वन में भैरव स्वरूप में प्रतिष्ठित होकर उस दिव्य शिवलिंग की सेवा करे, जो आगे चलकर कुण्डेश्वर महादेव के नाम से विख्यात होगा। साथ ही यह आशीर्वाद भी दिया कि जो श्रद्धालु भैरव का सम्मान करते हुए कुण्डेश्वर महादेव के दर्शन करेगा, उसे शिवकृपा के साथ मातृकृपा का भी अक्षय फल प्राप्त होगा।
यह प्रसंग सनातन दर्शन का अत्यंत सूक्ष्म संदेश देता है। माता पार्वती का क्रोध भी अंततः लोककल्याण का कारण बनता है और एक निष्कपट सेवक अमरत्व प्राप्त करता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में भैरव को केवल क्षेत्रपाल या रक्षक नहीं माना गया, बल्कि वे अनुशासन, सेवा, निष्ठा और आज्ञापालन के प्रतीक भी हैं। शिवालयों में भैरव की पूजा का महत्व इसी आध्यात्मिक सत्य की ओर संकेत करता है कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग अहंकार से नहीं, बल्कि विनम्रता और सेवा से प्रशस्त होता है।
यह कथा हमें “मातृ देवो भव” के वैदिक संदेश की भी स्मृति कराती है। भारतीय संस्कृति में माता को प्रथम गुरु और प्रथम देवता माना गया है। मनुष्य के जीवन में ज्ञान, संस्कार, धैर्य और करुणा का प्रथम बीजारोपण माता ही करती है। इसलिए हमारे यहां मातृआशीर्वाद को किसी भी सांसारिक उपलब्धि से अधिक मूल्यवान माना गया है।आज का युग विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग है। संसाधनों की कमी नहीं है, किंतु मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास का संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय कुण्डेश्वर महादेव की कथा अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होती है। एक विद्यार्थी के पास उत्कृष्ट पुस्तकें, आधुनिक तकनीक और श्रेष्ठ कोचिंग हो सकती है, किंतु परीक्षा के लिए घर से निकलते समय जब वह अपनी माता के चरण स्पर्श करता है, तब उसके भीतर जो आत्मबल जागृत होता है, वह किसी तकनीक से प्राप्त नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार किसी चिकित्सक, सैनिक, अधिकारी या उद्यमी के जीवन में कठिन निर्णय के क्षणों में माता का विश्वास और आशीर्वाद उसे ऐसी मानसिक दृढ़ता प्रदान करता है, जो अनेक बाहरी साधनों से भी संभव नहीं होती।
कुण्डेश्वर महादेव का संदेश यह भी है कि सेवा कभी निष्फल नहीं जाती। कुण्ड गण तत्काल अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सका, किंतु उसने सेवा और निष्ठा का मार्ग नहीं छोड़ा। अंततः वही सेवाभाव उसे भैरव के दिव्य पद तक ले गया। आज के समाज में भी यही शिक्षा उतनी ही प्रासंगिक है। परिणामों की अधीर प्रतीक्षा करने के बजाय यदि मनुष्य अपने कर्तव्य को ईश्वरार्पण बुद्धि से निभाए, तो सफलता समय आने पर स्वयं उसके द्वार पर आती है।
उज्जैन के चौरासी महादेव केवल धार्मिक पर्यटन के केंद्र नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति के जीवंत विश्वविद्यालय हैं। प्रत्येक शिवलिंग जीवन का एक नया अध्याय सिखाता है। कुण्डेश्वर महादेव हमें बताते हैं कि मातृभक्ति, अनुशासन, सेवाभाव और शिवनिष्ठा—ये चारों मिलकर मनुष्य के जीवन को पूर्ण बनाते हैं। भैरव-पूजन का वास्तविक अर्थ भय नहीं, बल्कि धर्म की मर्यादा का पालन है; शिव-भक्ति का अर्थ केवल जलाभिषेक नहीं, बल्कि निष्काम सेवा है; और मातृकृपा का अर्थ केवल आशीर्वचन नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक शक्ति है जो जीवन के प्रत्येक संघर्ष में मनुष्य को अडिग बनाए रखती है।इसीलिए कुण्डेश्वर महादेव का यह पावन तीर्थ आज भी श्रद्धालुओं को केवल दर्शन का नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का संदेश देता है। जो मनुष्य माता-पिता का सम्मान करता है, सेवा को साधना मानता है और शिव के प्रति अटूट श्रद्धा रखता है, उसके लिए प्रत्येक कठिनाई अंततः कल्याण का मार्ग बन जाती है। यही कुण्डेश्वर महादेव की कथा का शाश्वत संदेश है और यही सनातन संस्कृति की अमूल्य विरासत।
क्रमश:

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button