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कैमरे की आंख से कहानी कहने तक—एफटीआईआई पुणे में सृजन की पाठशाला

पीआईबी भोपाल की टीम ने किया फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया का अवलोकन, प्रशिक्षण ले रहे विद्यार्थियों की कार्यप्रणाली और रचनात्मक प्रक्रिया को करीब से समझा

लोकसत्य | डॉ. नवीन आनंद जोशी
पुणे। भारतीय सिनेमा केवल पर्दे पर दिखाई देने वाले दृश्यों का संसार नहीं, बल्कि उसके पीछे चलने वाली कल्पना, तकनीक, अनुशासन और सामूहिक रचनात्मकता की लंबी प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया को करीब से समझने के उद्देश्य से पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी), भोपाल की टीम ने पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) का अवलोकन किया। इस दौरान टीम ने संस्थान में प्रशिक्षण ले रहे नवोदित विद्यार्थियों की कार्यप्रणाली, प्रशिक्षण पद्धति और सिनेमा निर्माण से जुड़े विभिन्न पक्षों को सूक्ष्मता से देखा।

एफटीआईआई परिसर में टीम ने विद्यार्थियों को सिनेमा की बुनियादी अवधारणाओं से लेकर व्यावहारिक प्रशिक्षण तक विभिन्न स्तरों पर काम करते देखा। कैमरा संचालन, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि, अभिनय, निर्देशन, पटकथा लेखन और संपादन जैसी विधाओं में विद्यार्थी प्रयोग करते नजर आए। इससे यह समझने का अवसर मिला कि पर्दे पर दिखाई देने वाले कुछ मिनटों के दृश्य के पीछे कितनी व्यापक तैयारी और तकनीकी दक्षता काम करती है।अवलोकन के दौरान शूटिंग प्रक्रिया और कैमरा फ्रेमिंग ने विशेष ध्यान आकर्षित किया। विद्यार्थी किसी दृश्य की कल्पना को कैमरे के माध्यम से प्रभावी रूप देने के लिए प्रकाश, कोण, पृष्ठभूमि और कलाकारों की गतिविधियों पर बारीकी से काम करते दिखाई दिए। वहीं संपादन प्रक्रिया में अलग-अलग दृश्यों को क्रमबद्ध कर कथा को प्रभावी बनाने की तकनीक को भी समझा गया।

एफटीआईआई की कार्यपद्धति की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह दिखाई दी कि विद्यार्थियों को केवल तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रखा जाता। उन्हें कहानी को समझने, समाज को देखने, सवाल उठाने और अपनी स्वतंत्र रचनात्मक दृष्टि विकसित करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है। यहां सिनेमा को मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों, संस्कृति, इतिहास और मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने के प्रभावी माध्यम के रूप में समझने पर जोर दिखाई दिया।

पीआईबी भोपाल की टीम ने प्रशिक्षण ले रहे विद्यार्थियों से संवाद भी किया और उनके अनुभव, रुचि तथा सिनेमा निर्माण की प्रक्रिया को लेकर उनकी समझ जानी। विद्यार्थियों में नए प्रयोग करने और अपनी कहानियों को प्रभावी दृश्य भाषा देने का उत्साह स्पष्ट नजर आया।

अवलोकन के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि डिजिटल तकनीक और बदलते संचार माध्यमों ने फिल्म निर्माण की संभावनाओं को व्यापक बनाया है। हालांकि तकनीक साधन उपलब्ध करा सकती है, लेकिन कहानी की मजबूती, दृष्टि की मौलिकता और मानवीय संवेदना ही किसी रचना को स्थायी प्रभाव देती है। पीआईबी भोपाल की टीम के लिए एफटीआईआई का यह अवलोकन महज एक संस्थागत भ्रमण नहीं रहा, बल्कि भारतीय सिनेमा की निर्माण प्रक्रिया को उसके मूल स्तर पर समझने का व्यावहारिक अनुभव बना। परिसर में प्रशिक्षण लेते युवा फिल्मकारों की सक्रियता यह संकेत देती है कि आने वाले समय में भारतीय सिनेमा को नई कहानियां, नए दृष्टिकोण और नई दृश्य भाषा देने वाली प्रतिभाएं इसी तरह की पाठशालाओं से निकलेंगी।

एफटीआईआई की प्रयोगधर्मी संस्कृति में कैमरा महज तस्वीर खींचने का उपकरण नहीं, बल्कि विचारों को दृश्य और संवेदनाओं को कहानी में बदलने का माध्यम बनता दिखाई दिया।

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