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84 महादेव यात्रा – 20वाँ पड़ाव: प्रतिहारेश्वर महादेव,जहाँ निष्ठा द्वार बन जाती है और भक्ति स्वयं प्रमाण पत्र

डॉ. नवीन आनंद जोशी

“पद जाए, मान जाए, सब जाए पर स्वामी के प्रति निष्ठा न जाए।”यह केवल एक वाक्य नहीं,यह सनातन चेतना का वह सूत्र है,जो मनुष्य को पद से नहीं,कर्तव्य से महान बनाता है। प्रतिहारेश्वर महादेव इसी सूत्र का सजीव प्रमाण हैं—जहाँ नंदी की निष्ठा ने उसे दंड से नहीं,दैवी सम्मान से अलंकृत किया।

सनातन परंपरा में उज्जैन केवल एक नगर नहीं—यह काल पर विजय का घोष है,यह समय के आर-पार खड़ी आस्था की राजधानी है।इसी पावन नगरी में, पटनी बाज़ार क्षेत्र में स्थित नागचंद्रेश्वर महादेव मंदिर के समीप एक प्राचीन, अल्पप्रसिद्ध किन्तु अत्यंत प्रभावशाली शिवलिंग विराजमान है। प्रतिहारेश्वर महादेव।
चौरासी महादेव परिक्रमा में यह स्थल केवल एक पड़ाव नहीं, महाकाल के दरबार का प्रथम द्वार है।‘प्रतिहार’ का अर्थ हैं द्वारपाल।सनातन व्यवस्था में द्वारपाल वह नहीं,जो केवल द्वार पर खड़ा हो,बल्कि वह जो मर्यादा, अनुशासन और निष्ठा का प्रतीक हो।प्रतिहारेश्वर महादेव उसी निष्ठा के शिवलिंग स्वरूप हैं।मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से जीवन में धन-वैभव, स्थिरता और प्रतिष्ठा का मार्ग खुलता है,किन्तु उससे भी बड़ा वरदान है—कर्तव्यबोध और आत्मिक संतुलन।
पौराणिक ग्रंथों में वर्णित है कि
भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के पश्चात महादेव दीर्घकाल तक एकांत साधना में लीन रहे।देवताओं को आशंका हुई कि यदि शिवपुत्र का अवतरण हुआ,तो उसका तेज त्रिलोक की व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।चिंतित देवगण देवगुरु बृहस्पति के मार्गदर्शन में शिवधाम पहुँचे।द्वार पर नंदी विराजमान थे—स्थिर, सजग और कर्तव्यनिष्ठ।महादेव की आज्ञा के बिना उन्होंने किसी को भी भीतर जाने नहीं दिया।इंद्र के आग्रह पर अग्निदेव ने हंस का रूप धारण कर गुप्त रूप से प्रवेश किया और शिव को देवताओं की चिंता से अवगत कराया।भगवान शिव बाहर आए,देवताओं को आश्वस्त किया ,पर कर्तव्य में हुई इस चूक के लिए नंदी को दंड मिला।दंडस्वरूप नंदी पृथ्वी पर गिर पड़े। वह क्षण केवल पीड़ा का नहीं था—वह आत्म परीक्षा का था।देवताओं के परामर्श से
नंदी महाकाल वन पहुँचे,और वहाँ गहन तपस्या आरंभ की।न कोई प्रश्न, न कोई शिकायत—
केवल शिव-स्मरण, केवल निष्ठा।नंदी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।
शिवलिंग से दिव्य वाणी गूँजी—
“हे नंदी!तुम्हारी निष्ठा ने तुम्हें दंड का नहीं,सम्मान का अधिकारी बनाया है।तुम्हारे प्रतिहार पद के कारण यह शिवलिंग ‘प्रतिहारेश्वर’ कहलाएगा।”यहीं से यह स्थल
प्रतिहारेश्वर महादेव के रूप में
सनातन परंपरा में प्रतिष्ठित हुआ।
महाकाल का प्रथम द्वार
सनातन मान्यता के अनुसार
शिव दरबार में प्रत्येक गण
अपने-अपने कार्य का अधिपति है।प्रतिहारेश्वर स्वरूप में नंदी,
महाकालेश्वर के द्वारपाल और रक्षक माने जाते हैं।इसी कारण श्रद्धालुओं की यह अटूट आस्था है कि—महाकाल से विशेष मनोकामना प्रकट करने से पूर्व
प्रतिहारेश्वर महादेव की वंदना करनी चाहिए।क्योंकि—जहाँ नंदी संतुष्ट होते हैं,वहीं शिव कृपा का द्वार स्वतः खुल जाता है। प्रतिहारेश्वर महादेव हमें यह सिखाते हैं कि—पद नहीं, कर्तव्य बड़ा है।अधिकार नहीं, निष्ठा शाश्वत है।और यदि भक्ति निष्कलुष हो,तो भगवान स्वयं
भक्त का नाम इतिहास में लिखते हैं।

✍️ डॉ. नवीन आनंद जोशी
ई-100/22, शिवाजी नगर, भोपाल (म.प्र.)

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