40 हजार करोड़ की संपत्ति पर सिंधिया राजपरिवार का ‘महा-समझौता’ फिर टला

आवश्यक अभिलेख नहीं होने से सुनवाई 20 जुलाई तक स्थगित, चार दशक पुराने विवाद के समाधान का इंतजार बरकरार
डॉ. नवीन आनंद जोशी
भोपाल/ग्वालियर। देश के सबसे चर्चित शाही पारिवारिक संपत्ति विवादों में शामिल सिंधिया राजपरिवार की लगभग 40 हजार करोड़ रुपये मूल्य की पैतृक संपत्तियों के बंटवारे का मामला एक बार फिर टल गया है। केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनकी तीनों बुआ—वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे सिंधिया तथा ऊषा राजे सिंधिया के बीच हुए आपसी समझौते को बुधवार को न्यायालय से कानूनी मान्यता मिलने की उम्मीद थी, लेकिन आवश्यक अभिलेख न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किए जा सके। इसके चलते न्यायालय ने मामले की सुनवाई 20 जुलाई तक के लिए स्थगित कर दी।
इस सुनवाई को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा था क्योंकि सभी पक्षकार ऑनलाइन माध्यम से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर समझौते की औपचारिक पुष्टि करने वाले थे। हालांकि तकनीकी और दस्तावेजी औपचारिकताएं पूरी नहीं होने से समझौते पर अंतिम न्यायिक मुहर फिलहाल नहीं लग सकी।
सिंधिया राजपरिवार की संपत्तियों को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि कई दशक पुरानी है, जबकि इसका न्यायिक स्वरूप वर्ष 2010 में सामने आया, जब उत्तराधिकार को लेकर विभिन्न पक्षों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। पिछले लगभग 15 वर्षों से यह मामला विभिन्न न्यायालयों में लंबित है। अब सभी पक्षों के बीच सहमति बनने के बाद यह पहली बार निर्णायक स्थिति में पहुंचा है।
यदि आगामी 20 जुलाई की सुनवाई में सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत हो जाते हैं और न्यायालय समझौते को स्वीकार कर लेता है, तो देश के सबसे प्रतिष्ठित राजपरिवारों में से एक का यह बहुचर्चित उत्तराधिकार विवाद औपचारिक रूप से समाप्त हो सकता है।
क्या है पूरा विवाद?
राजमाता विजयाराजे सिंधिया की पैतृक एवं पारिवारिक संपत्तियों के उत्तराधिकार को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था। उनकी बेटियों—वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे सिंधिया और ऊषा राजे सिंधिया—ने संपत्ति में समान अधिकार का दावा किया। दूसरी ओर उनके पुत्र स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के उत्तराधिकारी के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी अपने अधिकार प्रस्तुत किए। मामला पहले जिला न्यायालय और बाद में उच्च न्यायालय तक पहुंचा।
बीते कुछ वर्षों में न्यायालय ने सभी पक्षों को आपसी सहमति से विवाद समाप्त करने का अवसर दिया। इसी क्रम में कई दौर की बातचीत हुई, जिसके बाद समझौते का प्रारूप तैयार किया गया।
किन संपत्तियों को लेकर है विवाद?
सिंधिया राजपरिवार की जिन ऐतिहासिक एवं बहुमूल्य संपत्तियों को लेकर विवाद चला, उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
* जय विलास पैलेस, ग्वालियर
* शिवपुरी स्थित माधव विलास पैलेस
* हैप्पी विलास
* जॉर्ज कैसल
* कालियादेह महल
* दिल्ली स्थित ग्वालियर हाउस एवं अन्य अचल संपत्तियां
* पुणे का पद्म विलास पैलेस
* सिंधिया घाट
* गोवा सहित विभिन्न राज्यों में स्थित धार्मिक एवं व्यावसायिक परिसंपत्तियां
* पूर्व रियासतकालीन कंपनियों में हिस्सेदारी तथा अन्य निवेश
इन संपत्तियों का वर्तमान अनुमानित मूल्य लगभग 40 हजार करोड़ रुपये बताया जाता है।
न्यायालय की भूमिका
उच्च न्यायालय ने पूर्व सुनवाई में सभी पक्षों को निर्देश दिया था कि यदि आपसी सहमति बनती है तो उसका विधिवत समझौता न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि यदि निर्धारित समय-सीमा में समझौता नहीं होता है तो मामले की नियमित सुनवाई आगे बढ़ाई जाएगी।
बुधवार को हुई सुनवाई में समझौते को अंतिम कानूनी स्वरूप मिलने की संभावना थी, लेकिन आवश्यक अभिलेखों की अनुपलब्धता के कारण न्यायालय ने मामले को 20 जुलाई तक स्थगित कर दिया। अब अगली तारीख पर सभी दस्तावेज प्रस्तुत होने के बाद समझौते को वैधानिक स्वीकृति मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण
यह मामला केवल संपत्ति विवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति से भी जुड़ा रहा है। एक ओर ज्योतिरादित्य सिंधिया केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री हैं, वहीं वसुंधरा राजे राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और यशोधरा राजे सिंधिया मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुकी हैं। इसलिए इस पारिवारिक समझौते पर राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर लंबे समय से नजर बनी हुई है।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें 20 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि उस दिन सभी आवश्यक अभिलेख न्यायालय में प्रस्तुत हो जाते हैं और समझौते को कानूनी मंजूरी मिल जाती है, तो लगभग चार दशक पुराने इस पारिवारिक विवाद का औपचारिक पटाक्षेप हो जाएगा। इसके बाद संपत्तियों के स्वामित्व, विभाजन और संबंधित राजस्व एवं कानूनी प्रक्रियाओं को अंतिम रूप दिया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से न केवल वर्षों से लंबित मुकदमों का अंत होगा, बल्कि भविष्य में उत्तराधिकार संबंधी संभावित विवादों की संभावना भी काफी हद तक समाप्त हो जाएगी।



