मध्य प्रदेश

देवभोग का हीरा, सत्ता का खेल और ‘नजराना-शुक्राना’ का अनकहा सच

दो दशक पुराने विवाद की पड़ताल, जो आज भी कई सवाल छोड़ जाता है

डॉ.नवीन आनंद जोशी

भोपाल/रायपुर।छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले का देवभोग क्षेत्र आज एक बार फिर चर्चा में है। हाल के भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और हीरे की संभावनाओं को लेकर बढ़ी गतिविधियों ने उस पुराने विवाद की याद ताज़ा कर दी है, जिसने कभी अविभाजित मध्यप्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया था। हाल के सर्वेक्षणों में राज्य के कुछ क्षेत्रों में हीरे मिलने के संकेतों के बाद सरकार और एजेंसियाँ फिर संभावनाओं का आकलन कर रही हैं। देवभोग की कहानी केवल हीरे की नहीं है। यह राजनीति, नौकरशाही, कॉरपोरेट हितों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की ऐसी कहानी है, जिसके कई अध्याय आज भी पूरी तरह नहीं खुले हैं।

1990 के दशक के उत्तरार्ध में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की सरकार देवभोग क्षेत्र में हीरा अन्वेषण के लिए विदेशी निवेश को प्रोत्साहित कर रही थी। दुनिया की सबसे बड़ी हीरा कंपनियों में शामिल डी बियर्स ने भी इस क्षेत्र में रुचि दिखाई।सरकार की नीति के विरोध में भाजपा ने मोर्चा खोल दिया। उस समय भाजपा नेता बृजमोहन अग्रवाल सबसे मुखर चेहरों में थे। विधानसभा में आरोप लगे कि हीरा ब्लॉकों के आवंटन में पारदर्शिता नहीं है और सरकार बड़े औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचा रही है सरकार का पक्ष था कि आधुनिक तकनीक के बिना हीरे की खोज संभव नहीं और विदेशी विशेषज्ञता की आवश्यकता है।

प्रारंभिक चर्चा में विदेशी कंपनी को सीधे ब्लॉक देने की बात सामने आई। विरोध बढ़ने पर सरकार ने नई शर्त जोड़ दी कि विदेशी कंपनी किसी भारतीय साझेदार के साथ ही परियोजना में भाग ले सकेगी। यहीं से देश के चर्चित हीरा कारोबारी भरत शाह समूह की भूमिका चर्चा में आई। बाद में विजयकुमार छत्तीसगढ़ एक्सप्लोरेशन प्राइवेट लिमिटेड को देवभोग क्षेत्र में लगभग 4,600 वर्ग किलोमीटर में अन्वेषण का अधिकार मिला। उस समय खनिज विभाग के सचिव एस. लक्ष्मीनारायण इस पूरी प्रक्रिया के प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी थे।एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने पूरी खनिज नीति, तकनीकी प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।इसी बातचीत में उन्होंने दो शब्द कहे, जो वर्षों बाद भी याद किए जाते हैं—“नजराना” और “शुक्राना”।उनका कहना था कि बड़े अंतरराष्ट्रीय सौदों में अक्सर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अलग-अलग स्तर पर “संतुष्ट” करने की कोशिश की जाती है। उनके अनुसार, सत्ता पक्ष को बड़ा “नजराना” और विपक्ष को छोटा “शुक्राना” मिलता है।

यह टिप्पणी उनकी व्यक्तिगत राय थी। उन्होंने किसी दल, नेता, अधिकारी या कंपनी का नाम नहीं लिया था और न ही इस संबंध में कभी कोई न्यायिक या आधिकारिक निष्कर्ष सामने आया। उस समय प्रदेश भाजपा के सबसे बड़े नेता सुंदरलाल पटवा थे और लखीराम अग्रवाल प्रदेश अध्यक्ष थे।खनिज सचिव ने पत्रकारों से पूछा था कि आखिर शीर्ष नेतृत्व इस मुद्दे पर कितना मुखर है। कुछ समय बाद देवभोग विवाद धीरे-धीरे राजनीतिक एजेंडे से गायब हो गया। यही कारण है कि वर्षों बाद भी यह सवाल उठता है कि क्या विरोध वास्तव में सिद्धांतों का था या केवल राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम।हालांकि इस प्रश्न का कोई प्रमाणित उत्तर आज तक उपलब्ध नहीं है।
सन् 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद देवभोग नया जिला गरियाबंद का हिस्सा बन गया।तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने भरत शाह समूह को मिली अनुमति निरस्त कर दी।

सरकार ने आरोप लगाया कि सर्वेक्षण के नाम पर नमूने विदेश भेजे जा रहे हैं। कंपनी ने इन आरोपों से असहमति जताई और मामला वर्षों तक न्यायालय में चलता रहा । राजनीतिक विवादों, नीतिगत बदलावों और कानूनी उलझनों के बीच डी बियर्स को देवभोग परियोजना नहीं मिल सकी। बाद के वर्षों में भारत की खनिज नीति में भी बड़े बदलाव हुए और अधिकांश खनिज ब्लॉकों का आवंटन नीलामी आधारित प्रणाली से होने लगा ।देवभोग क्षेत्र में व्यावसायिक हीरा खनन शुरू नहीं हो पाया है। हालांकि छत्तीसगढ़ में विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक सर्वेक्षण जारी हैं और सरकार का दावा है कि राज्य में हीरे की नई संभावनाएँ मौजूद हैं। हाल के सर्वेक्षणों ने इस संभावना को फिर चर्चा में ला दिया है।

अब भी अनुत्तरित हैं सवाल
* क्या देवभोग विवाद केवल राजनीतिक था?
* क्या खनिज नीति में बदलाव किसी विशेष कारोबारी हित के लिए हुआ?
* क्या सत्ता और विपक्ष दोनों पर लगाए गए आरोपों की कभी निष्पक्ष जांच हुई?
* क्या किसी एजेंसी ने “नजराना” और “शुक्राना” जैसी चर्चित टिप्पणियों की सत्यता की पड़ताल की?
इन प्रश्नों का कोई प्रमाणित उत्तर आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ है ।
देवभोग हीरा परियोजना भारतीय खनिज इतिहास का ऐसा अध्याय है, जहाँ भू-विज्ञान, राजनीति, प्रशासन और कॉरपोरेट हित एक साथ दिखाई देते हैं।
दो दशक बाद भी यह मामला केवल इसलिए प्रासंगिक नहीं है कि वहाँ हीरे मिलने की संभावना है, बल्कि इसलिए भी कि प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन में पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वास का प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
इतिहास बताता है कि सरकारें बदलती हैं, नीतियाँ बदलती हैं, कंपनियाँ बदलती हैं, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों पर उठे सवाल वर्षों तक समाज और लोकतंत्र के सामने खड़े रहते हैं।

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